5. पारदारिक

5. पारदारिक

    चतुर्थ अध्याय : दूतीकर्म प्रकरण

    श्लोक (1)- दशितेगिंताकारां तु प्रविरलदर्शनामपूर्वां च दूत्योपसर्पयेत्।। अर्थ- जो स्त्री पुरुष पर अपने भाव संकेतों को तो प्रकट कर चुकी हो  लेकिन फिर भी मिलने-जुलने...

    तृतीय अध्याय : भावपरीक्षा प्रकरण

    श्लोक (1)- अभियुञ्ञानो योषीतः प्रवृत्तिं परीक्षेत। तया भावः परीक्षतो भवति अभियोगांश्च प्रतिगृह्वीयात्।। अर्थ- पुरुष जब किसी स्त्री से मिलता-जुलता है तो उसे स्त्री के स्वभाव...

    द्वितीय अध्याय : परिचयकारण प्रकरण

    श्लोक (1)- यथा कन्या स्वयमभियोगसाध्या न तथा दूत्या। परस्त्रियस्तु सूक्ष्मभावा दूतीसाध्या न तथात्मनेतयाचार्याः। अर्थ- कामशास्त्र के पुराने आचार्यों के मुताबिक जिस तरह से कुंवारी युवती...

    प्रथम अध्याय : स्त्री-पुरुष शीलावस्थापन प्रकरण

    श्लोक (1)- तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्ति चादित एवं परीक्षेत।। अर्थ- पराई स्त्री के साथ संभोग करने की इच्छा रखने से पहले यह सोच लेना चाहिए...