2. साम्प्रयोगिक

2. साम्प्रयोगिक

    अष्टम अध्याय-पुरुषायित प्रकरण (विपरीत रति)

    श्लोक-(1)- नायकस्य संतताभ्यासात्परिश्रममुपलभ्य रागस्य चानुपशमम्, अनुमता तेन तमधोऽवपात्य पुरुषायितेन साहाय्यं दद्यात्।। अर्थ : संभोग क्रिया में जिस समय स्त्री, पुरुष की तरह का व्यवहार करती है...

    सप्तम अध्याय : प्रहणनीसीत्कार प्रकरण

    श्लोक (1)- कलहरूपं सुरतामाचक्षते। विवादात्मकत्वाद्वा मशीलत्वाच्च कामस्थ।। अर्थ : इसके अन्तर्गत संभोग क्रिया करते समय प्यार को बढ़ाने वाले सुख-कलह को बताया जा रहा है। इसलिए...

    षष्ठम अध्याय-संवेशन प्रकरण : संभोग क्रिया आसन

    श्लोक (1)- रागकाले विशाल यन्स्येव जघनं मृगी संविशेदुच्चरेत।। अर्थ : इसमें संभोग क्रिया करने के अलग-अलग तरीकों को बताया जाएगा। श्लोक (2)- अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते।। अर्थ : अगर बड़ी...

    पंचम अध्याय : दशन छेद्यविधि प्रकरण

    श्लोक(1)- उत्तरौष्ठमन्तर्मुखं नयनमिति मुत्तवा चुम्बनवद्दशनरदन स्थानानि।। अर्थ : ऊपर वाला होंठ, आंख और जीभ को छोड़कर बाकी सभी वह अंग जिनमें चुंबन किया जा सकता है...

    चतुर्थ अध्याय : नखरदन जातिप्रकरण

    श्लोक (1)- रागवृद्धौ संघर्षात्मकं नखविलेखनम्।। नखच्छेद अर्थ : उत्तेजना के अधिक बढ़ जाने पर स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के शरीर पर नाखूनों को गढ़ाते हैं। श्लोक (2)- तस्य...

    तृतीय अध्याय : चुम्बन विकल्प प्रकरण

    श्लोक(1)- चुम्बननखदशनच्देद्यानां न पौर्वापर्यमस्ति। रागयोगात् प्राक्संयोगादेषां प्राषान्येन प्रयोगः। प्रहणनसीत्कृतयोश्च संप्रयोगे। अर्थ : नखक्षत (नाखूनों को गढ़ाना), दन्तक्षत (दांतों से काटना), चुम्बन आदि का प्रयोग अक्सर...

    द्वितीय अध्याय : आलिंगन विचार प्रकरण

    श्लोक-1. संप्रयोगाअंग चतुः षष्टिरित्याचक्षते। चतुःषष्टिप्रकरणत्वात्।। अर्थ- कामसूत्र के विद्वानों ने संभोग कला के 64 अंगों के बारे में बताया है। श्लोक-2. शास्त्रमेवेदं चतुःषष्टिरित्याचार्यवादः।।अर्थ- बहुत से आचार्य...

    प्रथम अध्याय : रताववंस्थापन प्रकरण

    श्लोक-1. शशो वृषोऽश्वइति लिंगतो नायकविशेषः। नायिका पुनमृगी वडवा हस्तिनी चेति। अर्थ- छोटे, बड़े या मध्यम आकार के लिंग के आधार पर पुरुष को शश (खरगोश),...