कब्ज -जानिए इसका कारण एवं निवारण

20
1495
loading...

सारी दुनिया भाग-दौढ़ की जिन्दगी में उलझी हुई है। आधुनिकता की चकाचैंध में सारी दुनिया एक दूसरे को ढकेलती हुई आगे बढ़ जाना चाहती है। आधुनिकता की चकाचैंध और दिन रात की भाग दौढ़ इन दोनों ने ही हमारे स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाल रखा है। सभी चिकित्सा शास्त्री चिन्तित हैं, कैसे इसका निदान किया जाये। 95 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रोग से पीड़ित दिख रहे हैं। मोटापा, रक्तचाप, मधुमेह, हृदय-दोर्बल्य आदि से प्रायः सभी भयभीत हैं। छोटे-छोटे किशोरावस्था के बच्चे तक इन भयंकर रोगों से पीड़ित दिखने लगे हैं। छोटी उम्र में ही आंखों पर चश्मों ने अधिकार जमा लिया है। शायद ही ऐसा कोई भाग्यशाली व्यक्ति हो जो कोष्ठबद्धता से मुक्त हो। इस कोष्ठबद्धता ने हम सवों को अपने शिकंजे में जकड़ लिया है।

स्वास्थ्य की चिन्ता तो हम सब करते ही हैं और करनी भी चाहिए पर शायद ही कोई समझता है कि स्वास्थ्य है क्या? स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है? मानव शरीर के विभिन्न संस्थानों की सुर-ताल और लय-युक्त संगीत की स्वर लहरी के समान अहर्निश कार्यरत रहने का नाम को ही स्वास्थ्य कहा जायेगा। मानव शरीर के विभिन्न संस्थानों में मुख्यतः श्वसन-संस्थान, संचलन संस्थान, पाचन संस्थान, वाहिर्गमन संस्थान और तंत्रिका संस्थान है। इसके अतिरिक्त और भी छोटे-मोटे कई संस्थान हैं- में सभी संस्थान आपस में ताल-मेल बिठाकर एक दूसरे का सहयोग करते हुए अहर्निश कार्यरत हैं। समझने के लिए एक छोटा सा उदाहरण लें- श्वसन संस्थान यानि नासिका ग्रन्थ से श्वास लेना-छोड़ना इसकी सामान्य गति है प्रति मिनट 18, चिकित्सा भाषा में मायोग्लोबिन एक शब्द आता है जो रक्त का परिचायक है, इसकी औसत संख्या है 290, तुलनात्मक दृष्टि से यदि देखें तो श्वास की गति 18 प्रति मिनट , नाड़ी की गति 72 और मायोग्लोबिन की गति 290 अर्थात 18:72:290 तो इसका अनुपात हुआ 1: 4: 16 ये अनुपात स्वस्थ्यता का परिचायक है अर्थात यह सारे संस्थान ताल-मेल बिठाकर एक दूसरे का सहयोग करते हुए चल रहे हैं यही स्वस्थ्यता का परिचायक है। इसमें तनिक भी असंतुलन हमारे शरीर को रोग ग्रस्त बनायेगा। नाड़ी की गति कम हुई तो चिन्ताजनक, अधिक हुई तो भी चिन्ताजनक। श्वास की गति कम या अधिक भी चिन्ताजनक, मायोग्लोबिन, हेमोग्लोबिन, केलेस्ट्राॅल कम याा अधिक हुई तो ये भी चिन्ताजनक।

संतुलन कैसे बिठायी जाये इन सभी संस्थानों का आपस में ताल-मेल बिठाना- ये हमारे शरीर का कार्य है। प्रकृति ने हमारे शरीर की संरचना बहुत ही अद्भुत और सुनियोजित ढंग से कर रखी है। हमारा मानव-शरीर स्व-निर्मित है, भले ही मां-बाप ने बीज-रोपण किया हो। यह शरीर स्वयं पोषित है, गर्भ में मानव-शिशु अपना विकास स्वयं करता रहता है। मानव शरीर स्वयं संरक्षित है, अन्दर की गन्दगी स्वयं बाहर निकालते रहती है किन्तु बाहर की गन्दगी शरीर में प्रवेश नहीं कर पाती। इस तरह प्रकृति ने इसे स्वयं संरक्षित कर रखा है।

यह शरीर स्वयं नियंत्रित है। शरीर के टूटन-फूटन का यह स्वयं मरम्मत कर लेता है। शरीर को सुगठित बनाये रखने में सुव्यवस्थित एवं स्वस्थ रखने के निमित प्रकृति की अपनी बहुत सुन्दर प्रणाली है यहां, किन्तु हम हैं कि अपनी बुद्धि और स्वभाव से इसके साथ कोई सहयोग नही कर पा रहे हैं। अपने गलत आहार-बिहार से शरीर को अस्वस्थ बना देते हैं, रोगीी बना देते हैं, फलस्वरूप कोष्ठबद्धता हमें तोहफे के रूप में मिल जाता है।

जब शौच को जायें, गोल आकार के पीले रंग के तीन चार गठे हुए मल के टुकड़े बैठते ही बाहर आ जाये और गुदा के बाहर आजू-बाजू मल का कोई अंश न रह जाये और दो-तीन मिनट पश्चात हम शौच से निवृत हो बाहर आ जाये तो यह सूचित करता है कि वो व्यक्ति स्वस्थ है। हम सभी विचार करें कि क्या यह लक्षण मुझमें परिलक्षित होता है, यदि नहीं, तो हम अस्वस्थ हैं, रोगी हैं। वैसे प्रायः हम सभी केष्ठबद्धता के शिकार हैं ही। कुछ लोग इसे बीमारी नहीं मानते पर है ये सभी बीमारियों की मूल जड़। हरनिया, बबासीर, भगन्दर, कोलाइटीज, गैस की शिकायत, पेट दर्द, सर दर्द इन सभी के पीछे कोष्ठबद्धता एक मात्र कारण है।

भोजन करने के तरीके यदि हम जान लें तो कोष्ठबद्धता हमें कभी नहीं सतायेगी। भोजन करने वाले चार प्रकार के लोग होते हैं- एक तो स्वाद के लिये भोजन करते हैं, यह स्वाद बुद्धि वाले कहे जाते हैं, दूसरे पुष्टि बुद्धि वाले होते हें, जो शरीर के पोषण हेतु आहार लेते हैं, तीसरे प्रसाद बुद्धि वाले होते हैं, भक्त लोग जो भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण करते है और चौथे साधन बुद्धि वाले होते हैं शरीर को जितनी और जैसी आवश्यकता है मात्र उतना ही वो आहार लेते हैं। ये साधन बुद्धि वाले होते हैं। शरीर की साधना और अपनी दिनचर्या की भी साधना। स्वाद-बुद्धि, पुष्ट-बुद्धि और प्रसाद बुद्धि वाले जो आहार लेते हैं प्रायः ये सभी रोगी होते हैं, कोष्ठबद्धता से ग्रसित रहते हैं।

कोष्ठबद्धता से मुक्त होने के लिए प्रायः हम सभी लोग नित्य प्रति औषधियों का सेवन करते हैं- ये औषधियां घोड़ों पर चाबुक मारने की तरह काम करती हैं। आन्तिरिक अंश-अव्यवों को अपने प्रभाव में लेकर मल-मूत्र का त्याग कराती है। औषधियां जब तक सेवन करते हैं, पेट कुछ साफ हो जाता है पर पूर्ण रूप से नहीं। औषधियों का सेवन बन्द होते ही पूर्व स्थिति बनी रहती है।

कुछ लोग पेट साफ करने के निमित्त जुलाब लेते हैं- यह एक तेज दवा होता है जिसका बराबर प्रयोग करते रहने से हमारा शरीर के मल- निःसारण यंत्र शिथिल एवं निष्क्रिय होते जाते हैं, जिसका शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ लोग नशीली चीजों का प्रयोग पेट साफ करने के लिये जैसे- तम्बाकू, बीड़ी-सिगरेट, चाय काॅफी आदि। ये सभी बुरी आदतें हैं। एक बार लत पड़ गई तो फिर छूट्ती नहीं। इसका दुःष्प्रभाव समस्त शरीर पर होता है और हम जिन्दगी भी दुखी रहते हैं।
अन्य कारणों में असंतुलित भोजन का लेना, बिना भूख भोजन करना और यदा-कदा ठूँस-ठूँस कर खाना ये कोष्ठबद्धता लाता है, हाजमा बिगड़ जाता है।

कोष्टबद्धता से पीड़ित रोगी तली-भुनी चीजों को अथवा तेल-घी से बनी चीजों का प्रयोग कम से कम करें। जलेबी एवं अन्य मीठी वस्तुओं से परहेज करें। अधिक उम्र वाले दाल का प्रयोग न करें। रेशेदार हरी सब्जियां एवं फलों का सेवन अधिक करें। मैदे से बनी चीजें तो इनके लिए वर्जित है। भोजन के समय जल का सेवन न करें। भोजन से एक घंटा पूर्व अथवा बाद यथेष्ट मात्रा में जल का सेवन करें। प्रातःकाल बस्ति-क्रिया अवश्य करें।

यदि हम सभी योग का सहारा लें तो केवल केष्ठबद्धता ही नहीं, अन्य भयंकर रोगों से भी मुक्ति मिल सकती है। यदा-कदा प्रातः काल वस्ति-क्रिया का प्रयोग करें। प्रातः-सायं आसन-प्राणायाम आधा घंटा करें और यथेष्ट मात्रा में शुद्ध जल का सेवन करें। आसनों में त्रिकोणासन, अर्द्धकटि-आसन, कटि-चक्र-आसन, पाद हस्त आसन, भुजंग आसन, मयूर आसन, सर्वांग आसन आदि प्रत्येक एक-दो मिनट किया करें। प्राणायाम में अनुलोम-विलोम, भात्रिका, कपालभाति और अग्निसार क्रिया ये नित्य करना।

विचार हमेशा सकारात्मक होना चाहिए, नकारात्मक नही। सूर्योदय एवं एक-आध घंटा शुद्ध हवा में 4-5 किलो मीटर टहलना सेहत के लिए अत्यंत लाभदायक है और इसके साथ यदि भ्रमण-प्राणायाम जोड़ दिया जाये तो सोने में सुहागा।

चन्द्रभान गुप्त (योगाचार्य)
वृन्दावन (उ0प्र0)

20 COMMENTS

  1. 883889 900053Youre so proper. Im there with you. Your weblog is surely worth a read if anyone comes throughout it. Im lucky I did because now Ive obtained a entire new view of this. I didnt realise that this concern was so critical and so universal. You completely put it in perspective for me. 356843

LEAVE A REPLY